तमाशा……(रै कबीर)

तेरा जानबूझकर मेरे पास से खामोश निकलना
और दूर खङे होकर फिर से निहारना
कहाँ से लाती हो इतनी सहनशीलता
मेरा तो सरेआम तमाशा करने का दिल करता है।।
( रै कबीर )

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