एक घर ऐसा ढूंढ रहा हूँ……(रै कबीर)

एक घर ऐसा ढूंढ रहा हूं
जहाँ चारदिवारी
शोहरत की ना हो
जहाँ दरवाजा
नफरत का ना हो ।।
(रै कबीर)

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