मशालें जलने दो

मशालें जलने दो दिलों में
प्यार की कुछ चिंगारी उठने दो
नफरत का अंधेरा बुझे इस तरह
के इन्सानियत पे अपने कदम बढने दो !!

जात-पात पे सिमटी हर सोच, लालच से घिरा हर अरमान
सरहद पे कभी नजरों की रंजिश, तो कभी भेजा गया गोलियों का फरमान !
मशालें जलने दो हर सोच पे, इबादत एक दूजे पे कर लेने दो
रुसवाई के बादल हटे इस तरह, के मुस्कान के कुछ गुल खिलने दो !!

कभी बेआब्रू होती रही औरों से, तो कभी घर की पहेलियाँ जंजीर बनी
हर उम्र की कहीं लगती है बोलियाँ, कभी दुनियाभर के रिश्तों की तकदीर बनी !
मशालें जलने दो हर सीख पे, के रूह में इनायत को समझने दो
घडी की नोक जैसी उसकी जिंदगी में, फुरसत की घडियाँ उसे चुनने दो !!

बेरोजगारी, भूखमरी तो कहीं सूखा सावन, मँहगाई की पहचान बना सबका अरमान
हालातों से बेसब्र हुआ इमान कहीं, रिश्तों की नीव पर दूरीयों का इम्तिहान !
मशालें जलने दो उम्मीदों पे, हौसलों पर कभी तारीख लगने दो
आशियाना ना टूटे नेक इरादों का, जिंदगी के आँगन में कुछ लकीर लगने दो !!

चुनाव का बाजार कहीं लगता है मेला, कोई खेले आँखमिचौनी कोई अदला-बदली
हार जीत के किस्सों की अनगिनत जुबानी, आखिर में छुपाली सारी जमा-पूँजी !
मशालें जलने दो हर लब्ज पर, वादों के एहसास को कुछ परखने दो
कुछ आँखों मं आज भी आस बाकी है, रोशनी के कुछ पलों में उन्हें चमकने दो !!

मशालें जलने दो हर करम पे
इतिहास को खुद अपना गवाह बनने दो
सफर लंबा जरूर है सबका
के सदियों के लिहाज में अपना अक्स तरशने दो !!

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/01/2016

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