सुदामा चरित भाग 11

करि सिंगार पिय पै गई, पान खाति मुसुकाति।

कहौ कथा सब आदि तें, किमि दीन्हों सौगाति।।106।।

 

 

कही कथा सब आदि ते, राह चले की पीर।

सेावत जिमि ठाढो कियो, नदी गोमती तीर।।107।।

 

 

गये द्वार जिहि भाँति सों, सो सब करी बखानि।

कहि न जाय  मुख लाल सों, कृस्न मिले जिमि आनि।।108।।

 

 

करि गहि भीतर लै गए, जहाँ सकल रनिवास।

पग धोवन को आपुही, बैठे रमानिवास।।109।।

 

 

देखि चरन मेरे चल्यो, प्रभु नयनन तें बारि।

ताही सों धोये चरन, देखि चकित नर-नारि।।110।।

 

 

बहुरि कही श्री कृस्न जिमि, तन्दुल लीन्हें आप।

भेंटे हृदय लगाय कै, मेटे भ्रम सन्ताप।।111।।

 

 

बहुरि कही जेवनार  सब, जिमि कीन्हीं बहु भाँति।

बरनि कहाँ लगि को कहै, सब व्यंजन की पाँति।।112।।

 

 

जादिन अधिक सनेह सों, सपन दिखायो मोहिं।

सेा देख्यो परतच्छ ही,सपन न निसफल होहिं।।113।।

 

 

बरनि कथा वहि विधि सबै, कह्ययो आपनो मोह।

वृथा कृपानिधि भगत-हितु-चिदानन्द सन्दोह।।114।।

 

 

साजे सब साज-,बाजि गज राजत हैं,

विविध रूचिर रथ पालकी बहल है।

रतनजटित सुभ सिंहासन बैठिबे को,

चौक कामधेनु कल्पतरूहू लहलहैं।

देखि देखि भूषण वसन-दासि दासन के,

सुख पाकसासन के लागत सहल है।

सम्पति सुदामा जू को कहाँ लौं दई है प्रभु,

कहाँ लौं गिनाऊँ जहाँ कंचन महल है।।115।।

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