भ्रम

सूखे ढेर पर
आग सदा से आती है
दीये की लौ
नीचे अंधेरा बन जाती है
ये मासूमियत क्यों उभरी
आंखों में उदासी बन कर
मेरी आवाज क्यों बिखरी
दिल पे जख्म बन कर,
यह कैसी आंधी चली
जो आंसुओं को जला गई
एक थमी सी आस को
वो मेरे बुझा गई
मन का भ्रम भी टूट गया
दिल से बंधा था जो
उम्मीदों का क्रम वो छूट गया।

……. कमल जोशी ……

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