क़त्आ ( मुक्तक )11फिर से खुशिओं के अब्र छाएंगे 

oo
फिर से खुशिओं के अब्र छाएंगे !!
डूबते तारे झिल मिलाएंगे !!
माना पतझड में हम हुए वीरां !!
अब की सावन में लहलहाएँगे !!
oo
doobte tare jhilmilaenge !!
mujhko utna qareeb paenge !!
mana patjhad me ham hue veera !!
ab ke savan me lahlhaenge !!
oo
सलीम रज़ा रीवा – 9981728122
muktak , qataa by salimraza rewa

Leave a Reply