दायित्व………….

वर्षो पहले जब तुम गये थे छोड़
समग्र रिश्तों को तोड़कर
तो सब ले गये थे साथ
जितना तुम्हे याद रहा होगा तब
तुमने जाने भर कुछ न छोड़ा ,
अपने प्रेम की उस निलामी में
हमने देखा था लोरित आॅखों से
स्वयं को उजड़ते हुए
स्पनों को बिखरते हुए,
सावन जैसे प्रमुदित मुखमण्डल को
पतझड़ होतेे हुए
पर तुम विस्मित हो गये शायद
स्मरण को ले जाना अपने साथ
या फिर जानबूझ कर छोड़ गये
जिसको लिये आज भी पल पल ढोता हूं
जैसे कि –
स्मरण होना तुम्हारा अद्यिकार है
और मैं स्मरण करता रहूं
ये मेरा दायित्व।

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  1. davendra87 davendra87 25/01/2016

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