गा रहा हूं

जैसे भंवरा कोई
भ्रमण करता उपवन उपवन
गूंजन का मधुर स्वर बिखराता फिरता

बर्तन मांजने से चमकता है
विवेक अध्ययन से
प्रेम आभास व विश्वास से

सब पीछे छूट गए
प्रेम है जिसे आजमा रहा हूं
मैं बस्ती बस्ती गा रहा हूं।

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