तुम थी ही नहीं

मुद्दतों तुमसे अठखेलियां करता रहा
लिपट दामन से तेरे आह मैं भरता रहा
था प्रेम में तेरे जीता और मरता रहा
पर नींद से जागा तो तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं

लगने लगा यहीं पर तुम कहीं से आ गई हो
अपनी दस्तक हमारे इर्द गिर्द बिखरा गई हो
आतुर हुआ उठकर जब एक दीद की खातिर
किवाड़ जब खोला झटककर तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं

किताबों में ढूढ़ा तुझे ख्यालोें में ढूढ़ा तुझको
जबाबों में ढूढ़ा तुझे सवालों में ढूढ़ा तुझको
न जाने कौन सी दुनियां जहां पे खो गई हो
अब लगता यही कि हमनवा तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं
तुम थी हि नहीं

जफा मंाझी का हो तो किनारा मिल नहीं सकता
घर अपना नहीं हो तो गुजारा मिल नहीं सकता
अपने ही सातीर हो फिर गैरों का क्या कहना
राह में था मैं अकेला हमसफर तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं

तुमसे मुझे यादें मिली तड़पन मिली थी बस
उम्र भर की कांट की उलझन मिली थी बस
खुशियों में तुम्हे पाने की कोशिश लाख की
एक गम के सिवा और कुछ तुम थी नही
तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं

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