लोर

उठता है कोई तूफान
मचता है भयंकर हलचल
बिछ जाती है
अंबर में काली बदली
और
अथाह बूंद की सागर लिए
अंबर की आगोश मे
लगती है मॅडराने
व जब
बूंदो की भार सह नहीं पाती
तब बरस जाती है
सारे बंद्यन तोड़कर ,
जैसे इसी तरह के प्रकृया में
आॅखों से बरसतें हैं लोर
विवश होकर
दुख का बोझ न सहने पर
निर्बाध होकर
मन के चोट का
प्रतिनिधित्व करते हुए।

Leave a Reply