कोई है ?

मत रोना मेरी शहादत पे , मैं तो एक सिपाही हूँ,
सँजो के रखना आँखोंके मोती रोहित और अख़लाक़ केलिए |
मैं तो हूँ ही सिरफिरा जो जीता हूँ सिर्फ वतन को ,
फुरसत कहा मुझको फ़क्त दादरी – हैदराबाद केलिए |
शुक्र है की सिपाही की कोई जात नहीहोती ,
नही तो रोती मेरी बेवा कफ़न औ कागजात के लिए |
सहिष्णुता की लड़ाई जहीन सारे लड़ रहे ,
कोई क्यों एक लफ्ज नही बोलता कौम की हालात केलिए |
चार भारत रत्न लेकर घराना एक बैठा है,
जो नसल और फसल गोरो की वतन पे थोपे बैठे है –
पुश्त-दर-पुश्त मिटते गये वतन की आन की खातिर ,
भटकते है वो दर-बदर फ़क्त अपनी ही पहचान केलिए………………….

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  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/01/2016

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