पिता का दर्द

वो दर्द जो मैंने महसूस किया
उन दो प्यासी सी आँखो मे
कलेजा सी चीरती चिंता
झूठी मुस्कान थी बातो मे
ना समझ सकी क्यू कहती है दुनिया
बेटिया बोझ सी होती है
वो पगडी की इज्जत की रक्षक
वो अनचाही खोज सी होती है
मै बचपन से लडती आयी
क्यू लडको पर दुलार लुटाते हो
मुझे पता है मै हूँ कलेजे का टुकडा
पर क्यू मेरे अरमान दबाते हो
मै काँप उठी अन्दर तक
देखकर घर के हालात
वो पिता है कई बेटियो के
समझू कैसे जज्बात
लव मैरिज मे मिल जाये धोखा
अरेंज मे लडको की बोली लगाते है
पढी-लिखी,सुन्दर,सुशील बहू तो ठीक है
वो दहेज का चिट्ठा पकडाते है
शीश झुकाकर मेरे पापा उनके नखरे उठायेंगे
वो शहनशाँ बनकर हुक्म अपना चलायेंगे
मुझे पढाया लिखाया लाखो का इन्तजाम किया
शादी के खर्चे की चिंता का,आँखो ने पैगाम दिया
ना कमी रहे मेरी बेटी को
वो हमेशा झुकता आया है
पिता पर कब बोझ थी मै
लडके वालो ने बोझ बनाया है
बुढा हो गया मेरा बाप
हमको पढाने लिखाने मे
भाई भी झुक गया देखो
बहन को विदा कराने मे
ना जुड पाये इतने पैसे
जो सबकुछ मुँह पर मार आये
एक की माँग तो पूरी भी कर दे
और बेटियो की विदाई कैसे कराये
मै गरीब हूँ अफसोस नही है
मेरी बेटी बस खुशहाल मिले
वो कोल्हू का बैल बन गए
बस अच्छा सा परिवार मिले
अब नही देखा जाता मुझसे
पिता का मुरझाया चेहरा
दुल्हे के बदले मे जाते
कार ज्वेलरी अगैरा वगैरा
बेटी के ख्याल मे ये नही है
कैसा होगा मेरा दुल्हा
डर लगता है क्या माँगेगा
कैसे जलेगा ये चुल्हा
मेरी चली तो यू ही मर जाऊ
ऐसा घरबार बनाने से
अपने लोगो को बेच के बोलो
क्या खुशी परिवार बनाने से।

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  1. omendra.shukla omendra.shukla 04/02/2016

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