“आतंक”

“आतंक”
चेहरा वही है,सूरत वही है,
हैवान वही है,शैतान वही है,
क्या हश्र होता होगा अल्लाह के दरबार में,
जो नादान को,बेकसूर को,बेसहारा को,कमजोर को,
उस छोटे मासूमो को जो दिये कि तरह पल में बुझा देते है,
माँ-बाप,बहन-भाई तो उनके भी होते होंगे,
फिर क्यों अपनापन नही रहता उनमे,
किस जूठी शान को पाने को तत्पर है,
क्या कसूर है उन मासूमो का,
सुना जो स्कूल गए और घर नही आये,
इतनी भी क्या दरिंदगी,क्यों ये इतनी दहशत,
इंसान हो नेकी के रस्ते पर चलो,
मत सोचना के अमर हो जाओगे,
मौत भी ऐसी नसीब होती है फिर,
देखो हाथ कहा,लात कहा,आँख कहा,
क्यों रहम नही,क्यों तरस नही,
इंसान हो के ऐसी फितरत,
कहा से सीखा,जब जन्मे हो माँ कि कोख से,
ऐसी भी क्या जिंदगी कि कहा कब कैसे मौत नसीब हो जाये,
ऐसे कर्म करने को क्यों अमादा इतने,
क्या से क्या हो गया,कहा गबन है इंसानियत भी,
क्यों ये साया भी काला पड़ गया,
लिबाज़ भी काला है सोच भी काली पड़ गई,
बुरी सोच, बुरे काम, फिर बुरे नतीजे,
चेहरा भी खुद उस धुंए जैसा काला हो गया,
माँ को बाटने कि सोचोगे तो कुछ हाथ नही लगेगा,
लाश को भी चील कौए नोच खाएंगे,
डूब मारो चुल्लू भर पानी में,
बेहतर मौत है ये उस मौत से जो मासूमो,बेगुनाहो को मारने से मिलती है!

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