||मजहबी भारत ||

“सम्बोधन कई अपनाये थे दादरी में
हिन्दू आतंक ,हिन्दू तालिबान
ना कोई सम्बोधन मालदा पे आता है
नाही किसी की पिसती है शान ,

सिर्फ हिन्दू ही क्यूँ दोषी होते है
हर कारणों में नाम गिनाये जाते है
मजहबी की बलिवेदी पे
क्यूँ सबसे पहले चढ़ाये जाते है ,

आतंक का कोई धर्म नही
फिर क्यूँ हिन्दू आतंकी कहलाते है
छोटी मोटी घटनाओं में
उपहास क्यूँ ये बनाये जाते है ,

आपसे में बैर रखना
नही होता मजहब का मकसद
फिर लोग क्यूँ मजहबी हो जाते है
क्या आतंक है मजहबी मकसद ,

सहानुभूतिया क्यूँ साम्प्रदायी हो जाती है
क्यूँ आंसू मजहबी बन जाते है
इंसाफ का अँधा तराजू भी
क्यूँ सहिष्णुता बनके आता है ,

क्यूँ गांधी वाली टोपियां यहाँ
सत्ता स्वार्थी बन जाती है
एक मजहब को मिलता इंसाफ
तो दूजे को गाली क्यूँ होती है ,

इंसाफ का मापदंड भारत में
क्या मजहबी आधार होता है
या फिर टुकड़ों में बांटता
यहाँ का संविधान होता है ,

क्यूँ अफ़साने गाली हो जाते है
क्यूँ हर्फ़ सवाली हो जाते है
मजहब के पारदर्शी पाखंडो में
क्यूँ लोग यहाँ जल जाते है ,

क्यूँ सत्ता में बैठे लोग
सेक्युलर दानव बन जाते है
पारदर्शिता का ढोंग रचाने वाली मिडिया
क्यूँ आखों पे पट्टी बांधे जाती है ,

क्यूँ बुद्धिजीवी जिन्दा लाश बन जाते है
क्यूँ दोष उन्हें नजर नही आते है
छोटी-छोटी घटनाओ का
क्यूँ मजहबी आधार बना जाते है ||”