ये प्यार

पल पल देख यूँ ना मुस्कुरा मुझे
ये अदा से पिघल जाता हूँ मैं
तू कहे या ना कहे इस अदा को प्यार समझ जाता हूँ मैं
तू बेवफा है ये कभी ना कह पाता हूँ मैं
तेरे ही वादों में फिर उलझ जाता हूँ मैं
चूंक तुझसे होती है अपने आप को दोषी बताता हूँ मैं
जाने क्यों तेरे हर धोके को गलती समझ जाता हूँ मैं
जग दर्पण दिखाये मेरे प्रेम का मुझे
दर्पण में ही कमी निकाल देता हूँ मैं
ना जाने क्यों एक बार फिर विश्वास तुझपे कर बैठता हूँ मैं
– काजल / अर्चना

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/01/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/01/2016

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