* कलही नारी *

कलही नारी बिपत की ओर ,
सुबह शाम मचाए शोर।

सास-ससुर की इज्जत न करे ,
देवर ननद को कहे लबरा ,
पति की वो बात न सुने
किसी रिश्ते को वो न गुणे
उसके दिल में कोई नहीं ठहरा।

कलही नारी बिपत की ओर ,
सुबह शाम मचाए शोर।

वो अपनी धुन में झूमती रहे ,
अपने काम को गुनती रहे ,
अपने को वो दिखाए सुपर ,
उसका कार्य है सबसे उपर ,
यह है उसकी मन की धारणा।

कलही नारी बिपत की ओर,
सुबह शाम मचाए शोर।

जब वो खाना पकाए ,
उस में से दे कुछ छुपाए ,
अलग से ले अपने लिए बनाए
एक दूसरे को एक दूसरे के खिलाफ भड़काए ,
उसका लक्ष्य है नफरत पालना।

कलही नारी बिपत की ओर ,
सुबह शाम मचाए शोर।

उसका है कहना अलग है रहना ,
अपना खाना अपना पहेरना (पहनावा),
घर परिवार अपनों से दूर रहना ,
नाक भव चढ़ाना इतराना ,
बात-बात पर झगड़ा के लिए तमतमाना।

कलही नारी बिपत की ओर ,
सुबह शाम मचाए शोर।