जिसे देखा नही मैंने

एक चेहरा जिसे देखा नही मैंने,
खींच रही हैं मुझको अपनी ओर,
मैं रोक रही हुं मुझको,,
वो पुकार रहे है अपनी ओर.
ना जाने वो चेहरा कैसा हो?
जैसा मैं सोंचू उसके बारे,
सीधा सादा वैसा हो,
जाने क्या खबर हो उसकी?
वो है भी मेरी सोंच जैसा या
कोई दुसरा हो.
वो पुकारते है मुझें
या मैं खुद खिंची चली जाती?
वो है भी या मैं
बेवजह सोचती जाती?
उस दुनिया मे क्यों जाना..
जहॉ कोई दुनिया हि ना हो.
एक रौशनी मिल जाऍ
मैं देख सकूंं मेरी रास्तो को
कहीं अन्जाने अन्धेरे में
मेरी पहचान गुम ना हो जाऍ.
खुदा जाने वहां क्या हो?
हो मेरी मन्जील या दुनिया विरान हो..
एक चेहरा जिसे देखा नही मैंने,
वो है भी हकिकत या सिर्फ मेरा ख्वाब हो..

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 20/01/2016

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