रिश्तों के जाल – शिशिर “मधुकर”

हसरतें बहुत थी हमें तेरे करीब आने की , पर रुकावट बन गई है कुछ रस्में इस जमाने की
हर तरफ हमने जो रिश्तों के जाल बुन लिए, फंस चुकी मछली ये अब कभी न बाहर आने की

हमने कसम जो ली तेरा हरदम साथ निभाने की, दुश्मनी हो गई है अब हमसे तो इस ज़माने की
वक्त ने हमको ये कैसे हाल में पहुँचा दिया, हिम्मत कभी हमने जो की किस्मत को आज़माने की

कौन कहता है कि चेहरे झूठ नहीं बोलते, माहिरी है कुछ लोगों में यहाँ पर सच को भी छुपाने की
दर्द को सह सह के हमने खुद को पक्का कर लिया, अब किसी आघात से ना चोट कोई आने की

पत्थरों का क्या है उनका सीना नहीं टूटता, चाहे गिरती रहे उन पे ये धार कितने भी साफ़ पानी की
मधुकर ये कैसे मोड़ पर आ गई है जिंदगी, अब तो ताकत भी नहीं है साथ वो खुद से रूठ जाने की

शिशिर “मधुकर”

9 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 21/01/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/01/2016
  2. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 21/01/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/01/2016
  3. salimraza salimraza 22/01/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/01/2016
  5. YUDHI 10/02/2016
  6. babucm C.m.sharma(babbu) 30/07/2016
  7. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/07/2016

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