||इश्क़ का दर्द ||

“तुम जब जब याद आओगे
हरदम मुझको तड़पाओगे
बसे हो जो तुम यादों में मेरे
हर लम्हा ख़ामोशी बढ़ाओगे ,

टूटे वादे ,रूठे किस्से
नए अरमान कौन सजाएगा
यादों की खाई में है पड़ा हुआ
फिर बसंत कौन बहायेगा ,

वो ख़ामोशी की लब्जो में
बाते नयनों में कैसे होंगी
टूटी जो ये प्रेम की धारा
फिर से शुरू कहा होंगी ,

विरह की यातनाये तेरी वो
पनघट की याद दिलाएंगी
सूखे पड़े उदधि में फिर से
आखों का जल भर जाएँगी ,

कब तक वीराना गुलशन होगा ये
कब तक दर्द से थर्रायेगा
होंगे फिर साथ कभी हम दोनों
वो वक्त नजर कब आएगा ,

बड़ी बेबशी छायी है आखों में
दर्द का सागर भरा है दिल में
कब तक चलेगा प्रेम का पहिया
जाने कब मिल जायेगा मंजिल में ||”