||घर के जयचंद ||

“कायर नहीं है यारों हम
ना युद्ध कोई हम हारे है
घर में छुपे जयचंदो ने
पीठ पे खंजर मारे है ,

करके पहरेदारी सरहद पे
क्या लाभ हमें मिल पायेगा
जब होंगे छिपे जयचंद घरो में
तो उनसे कौन फिर लड़ पायेगा ,

वीरों की जिस धरती को
लहू से हरदम हमने सींचा है
भुलाके क़ुरबानी हम शहीदों की
जयचंदों ने फिर से रेखा खींचा है ,

चिरके छाती इन गद्दारों की
देश सुरक्षित कर सकते हम
ना बजे असहिष्णुता का बाजा फिर
इस बात से केवल डरते हम ,

हे देशवासियों सुनों जरा
इस घर की सुरक्षा हमारी है
ध्यान रखो तुम थोड़ा आँगन में
कुछ बनती तुम्हारी भी जिम्मेदारी है ||”

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/01/2016
  2. omendra.shukla omendra.shukla 18/01/2016

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