ख़ाली …

ख़ाली घर है, घर में ख़ाली कमरा ,

कमरे में आलमारी पड़ी हुई है, ख़ाली

मै हूँ , थका बेबाक और बेबस …

भूखा हूँ ! खाने को भी कुछ नहीं ,

थाली और गिलास भी है ख़ाली,

बाहर कोई शोर नहीं, ना अन्दर ख़ामोशी है ,

वक़्त भी जैसे थम सा गया हो ख़ाली,

सोच रहा हूँ , थका हूँ , एक पहर सो जाऊ ,

लकड़ी का पड़ा तक्थ, है सख़्त और

एक पुरानी सी चादर बिछी है ख़ाली,

यहाँ से वहां ,जहाँ तक जाए नज़र ,

सब कुछ जैसे दिख रहा हो ख़ाली ,

और ग़मों से भरता मैं ,,

ख़ाली बैठा हूँ , बस ख़ाली “गुरु”

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/01/2016

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