निहारते चाँद

एै चाँद तु टुकुर टुकुर किसको निहारे?
आसपास तो भरी पड़ी है कितने झिलमिल सितारे,
मेरा भी कभी मन करता था , तारो को ज़मीन पे तोड़ के लाऊँ ,
मेरे ऑगन में उन तारो की सुन्दर सेज सजाऊँ ।

झिलमिल करते तारे और उपर खुला आसमान,
उनके बीच में मैं लगु जैसे , एक सुन्दर मोति समान।
तु तब देखता रहता नीचे ज़मीन पे है सब सितारे,
आसपास तो कोई नहीं है , अब तु किसे निहारे?

पर, तेरी बजे से तो जगमग करते आसमान में सब तारे ,
तु हि उनका ध्यान जो रखता तभी तो झिलमिलाते है सारे,
मैं क्यु छीनु बंधन चाँद तारो का, सुन्दर लगते है यह नज़ारे ,
तेरे पास ही टिमटिमाये वह , जब चाहे तु उसे निहारे।

4 Comments

  1. omendra.shukla omendra.shukla 16/01/2016
  2. shampa shampa 16/01/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/01/2016
  4. Sampa 16/01/2016

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