जज़्बात

तुम्हें पाने की चाह मे सब कुछ खो चुका हूँ मै
और आँसू नहीं आंखो मे इतना रो चुका हूँ मै
अब सामने आए हो पैगाम ए वफा लेकर
अरमानों की कब्र मे जब सो चुका हूँ मैं।
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दुनिया की नजर मे भले नाकाम कहलाऊंगा
टूटे हुए दिलों के पर काम तो आऊँगा
खिला न सकूँ कोई गुल तो क्या हुआ
गुलशन ए बहार का पैगाम तो लाऊँगा
मझधार मे कश्ती का तूफान ही सहारा है
अब तूफानों को ही अपना हाल बताऊंगा
बेफिक्र होके मेरे कातिल शहर मे आना
मै अपनी जुबां पे तेरा नाम न लाऊँगा ।
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न काटें बिछे थे न कोई फूल खिला था
जिस राह पे चला अकेला ही चला था
जब भी मिला धूप का मंजर हसीं कोई
उस रोज बहुत जल्दी सूरज ढला था
ये आम बात है यही कहते हैं लोग सब
उन्हे खबर कहां कि दिल कितना जला था
चलते रहे फिर भी बिना टूटे बिना थके
आंखो मे तेरे नाम का सपना जो पला था
पाना था तुझको खुद को खोकर भी अबके बार
मेरी उम्मीद से जुदा मगर किस्मत का फैसला था
न पा सके तुझको न खुद को आज़मा पाये
बेबसी का ऐसा सख्त “विनीत” मंजर मिला था

……………….देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 15/01/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/01/2016

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