बातें करता हूँ

मौत से पहले कई बार रिश्तों के नाते मरता हूँ
जाने क्यों फिर भी सात जन्मों की बातें करता हूँ

खोखली आँखों से नजर नहीं मिलाता मैं अब
महफिल में अक्सर खुद से ही बातें करता हूँ

मुद्दे जज्बे नहीं उगते चर्चा के खेत में आजकल
हर ख्याल में बस तेरी और तेरी ही बातें करता हूँ

कदम नहीं उठते कीचड़ के दलदल से बाहर फिर भी
सूरज के सुनहले रथ से तेज़ जाने की बातें करता हूँ

लफ्जों ने खो दिया है मतलब अपना
आँखों के इशारों से ही अब बातें करता हूँ

कौन दानव निगल रहा है इस गुलजार चमन को
हर नज्म में बस उनकी मय्यत की बातें करता हूँ

चाँद तारों की रोशनी में अब वो आकर्षण नहीं
हृदय गगन में उगते सूरज की मैं बातें करता हूँ

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