ग़ज़ल–: अपनी जुबां से कह नहीं सकते ।

दिलों के रंज-गम अपनी जुबां से कह नहीं सकते ।
दगा दे यार साहिल पर समन्दर सह नहीं सकते ।।

मचा ले खलबली चाहे यहाँ आगोश में लहरें ।
तूफां भी चाहे तो समन्दर बह नहीं सकते ।।

तजुर्बा था बहुत हमको हुनर भी काम ना आया ।
जिगर में जख्म ऐसे थे की मरहम भर नहीं सकते ।।

गुलों के गुलाबी रंग के कायल ये भंवरे भी ।
कांटे गर चुभे दामन ये जिंदा रह नहीं सकते ।।

“अनुज” देता है नसीहत यहां इन गम के मारों को ।
वो अक्सर टूट जाते हैं जो पत्थर ढह नहीं सकते ।।

गजलकार — अनुज तिवारी “इन्दवार”