मुझे डर है कहीं और मोहोब्बत हो न जाए

“मुझे डर है कहीं और मोहोब्बत हो न जाए”
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मुझे डर है कहीं और मोहोब्बत हो न जाए,
धुंधली सुबह में तेरे ख्वाब खो न जाए,
पल-पल तेरा इतंजार करता हुं,
तेरी नफरतों से बहुत डरता हुं,
मुझे डर है, तेरी नफरतों से कहीं और मोहोब्बत हो न जाए…
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मेरी नींद चुराले ऐसी है तेरी मुस्कान,
सोचता हुं इसे बनाए रखने के लिए करदुं खुद को कुरबान,
मुझे डर है, तेरी मुस्कान से कहीं और मोहोब्बत हो न जाए…
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हवा से उड़ती तेरी जुल्फे मेरी जाऩ निकाल लेती है,
इन हवाओं के इशारे से मुझे अपने पास बुला लेती है,
अपनी मोहोब्बत का इजहार एक बार कर चुका हुं,
और उस इजहार का फल तेरी नाराजगी से सह चुका हुं,
फिलहाल तेरी दोस्ती के साथ जिदंगी कट रही है,
पर
मुझे डर है, तेरी दोस्ती से कहीं और मोहोब्बत हो न जाए…..।॥
BY
PYAARA ANAND BAABU
published by
ALOK UPADHYAY
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One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 12/01/2016

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