मेरी डायरी के पन्ने- भाग- १

मेरी डायरी के पन्ने- भाग- १
सरे बाजार ढूंढ़ता हूँ गुजरे ज़माने को
एक शमा ही काफी है पूरा घर जलाने को
सरे बाजार ढूंढ़ता हूँ गुजरे ज़माने को
याद है आज भी वो दिन के जब छोड़ा था घर अपना
मेरे अपनों ने ठुकराया मुझे मेरे आशियाने से
सरे बाजार ढूंढ़ता हूँ गुज़रे ज़माने को
ज़िंदगी है तेरी पनाहों मे तू माने न माने
अपनों को भूल के करता फिरे गैरो से अफ़साने
दूर जाने के ढूंढा करे तू सौ बहानो को
सरे बाजार ढूंढ़ता हूँ गुजरे ज़माने को
हर एक बात पे कहता है हमे क तुम क्या हो
आज हम कुछ नही इसकी वजह भी तुम ही हो
करे बाते नई- नई हमें नीचाँ दिखने को
सरे बाजार ढूंढ़ता हूँ गुजरे ज़माने को
शुक्रिया मेरे महबूब जो तूने दर्दोगम दिया
इस हसीं दर्द ने हमें औरो के काबिल बना दिया
यारो ढूंढो मेरी खातिर अब एक नए ठिकाने को
सरे बाजार ढूंढ़ता हूँ गुजरे ज़माने को
एक शमा ही काफी है पूरा घर जलाने को

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  1. Imran Ahmad 12/01/2016

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