वक़्त

वक़्त कहाँ गुजर गया,
यह समा कहाँ बीत गया ,
अभी तो ठेहेरे थे यहाँ ,
पर वक्त में टेहेराव कहाँ ?
पीछे की यादें कर रहे थे ताजा ,
पर वक़्त आगे बढ़ता गया ,
चाल धीमी कर सम्भल रहे थे अभी,
पर वक़्त की चाल से पीछे रह गये तभी ,
दौड़ना नही चाहते थे ,पर वक़्त ने रुकना कहाँ सीखा.

दूरियों को दूर कर रहे थे ,
कि वक़्त ही निकल गया कितनी आगे ,
वक़्त के साथ चलते चलते इतनी आगे आ गये
पीछे देखा ,तो वोह दिन “यादें ” बन गये
यादों को याद करने का समय नही अब
वक़्त के साथ चलना है बस ,
वक़्त हर दर्द का मर्हम है ,
वक़्त वक़्त पर साथ आता हैं जो , वक़्त के साथ
एकदिन याद बन जत है.

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