“प्रकृति-३”

कभी सांझ में टिम-टिम करते दीयों सी
सलमें-सितारों से जड़ी धानी चुनर ओढ़े
माथे पे चाँद का टीका सजाए और अलकें बिखराए
पलकों में घनी घटाओं का काजल सजाए
नागिन सी बलखाई वेणी में
पुष्पों की लटकन लटकाए
इठलाई सी,भ्रमित हुई सी
कौन दिशा से आई हो?
कल देखा तुझे जलधि तट पर
परसों बादलों पे कारवां तुम्हारा
आज मिली हो निर्जन वन में
शावक छोने सी,चंचल हिरणी सी
इस लोक की हो सुन्दरी या
और लोक से आई हो
क्षितिज छूती सी,सब्जपरी सी
मेरे सपनों में रची-बसी सी
धुंधली सी तस्वीर तुम्हारी
मनभावन सी परछाई हो

“मीना भारद्वाज”

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