बूढी माँ: a sad poem

कविताओं में जो माँ, चार धाम से भी बड़ी दिखी …..
यथार्थ में ‘बूढी काकी’ सी, कूड़ेदान में पड़ी दिखी ../१/

दुग्ध-अमृत पी बढ़े हुए, बेटे सभी अफसर बने …
प्रथम गुरु रही बूढी माँ, वृद्धाश्रम में खड़ी दिखी …/२/

बच्चों की ख़ुशी के लिए, प्रार्थना में रही जो सदा
रोशनीहीन उन आँखों में, सावन की झड़ी दिखी …/३/

बेटे व्यस्त थे मीटिंगों में, लाश लावारिश रही….
इस कारनामे पर, मानवता शर्म से गड़ी दिखी…/४/

दवाइयों के अभाव में, मधुमेह जिसे खा गया …
मृत माँ की तस्वीर ‘मधु’, सोने में जड़ी दिखी…/५/
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3 Comments

  1. amit rajan 11/01/2016
  2. anya 13/01/2016

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