आलोचना

मज़ा आता है, दूजे की बुराई में l
ये दिल बाग़-बाग़ हो जाता है ll
औरो के लिए समय हो न हो l
इसके लिए समय निकल जाता है ll

बेशक लाख कमियाँ हो अपने में l
वो कभी किसी को नज़र नहीं आती ll
दूजे की एक कमी को पाकर l
बार-बार उंगलियों पर गिनी जाती ll

जितना समय लगाते है बुराई में l
यदि वो समय अच्छाई में लगाये ll
इससे अपनी कमियाँ भी दूर होंगी l
और शायद दूजे को अपनापन दे पाये ll

समय किसी के रोके नहीं रूकता l
फिर बुराई में क्यों समय गवाना ll
समय का सदुपयोग करो मेरे भाई l
क्योकि समय फिर वापस नहीं आना ll

बुराई अपनों से अपनों को दूर करेंl
अच्छाइयाँ गैरों को अपना बनाती है ll
एक उंगली दूजे की तरफ जब उठती है l
तो बाकि तीन अपनी तरफ ही आती है ll

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/01/2016
    • Rajeev Gupta Rajeev Gupta 12/01/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/01/2016
    • Rajeev Gupta Rajeev Gupta 12/01/2016

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