||एक शहीद के पत्नी की व्यथा ||

“कब सपनो में मेरे आओगे
फिर कब मुझे सताओगे
दूर कहा थे जाने को मैंने
था नहीं यकीं इतना दूर चले जाओगे,

वो माँ की टूटी उम्मीदों को
कैसे यकीं दिलाओगे
बहते आखों से पानी को
फिर कैसे रोक पाओगे ,

वो नन्ही सी किलकारी को
कैसे गीत सुनाओगे
वो भोलाभाला मासूम सा यौवन
अब कैसे उसे मनाओगे ,

वो राखी की थाली बहना की
अब कैसे उसे सजाओगे
दुशिया रोशनी में जीती आखों को
अब कौन रह दिखायेगा ,

आने वाली नन्ही परी को
क्या छोड़ ऐसे ही जाओगे
पिता के वात्सल्य से वंचित क़दमों को
कैसे खुद का एहसास दिलाओगे ,

सच कहु बहुत ही रोयी है
अपनी सुध-बुध मै खोयी हु
आँखों से बह रहा दर्द का पानी
अब बिन तुम्हारे कैसे जीउ मै ||”

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/01/2016
  2. Sampa 08/01/2016
  3. omendra.shukla omendra.shukla 09/01/2016

Leave a Reply