तुम कौन हो

यह हवा बतला रही
तेरे बदन की सुगन्ध
छू कर चली जो
तेरा झिलमिल आंचल,
तुम कौन हो
जो सावन के शोर में
भूतल में उतरी हो,
मुख पे पानी की बूंदे
केशों में उलझे पुष्पक्रम
और भीगा तेरा आंचल
यौवन सजा रहा,
अधरों की कलियां
अभी अधूरी सी लगती
केश पाश भी है खुला हुआ
अनन्त गगन में कोई नहीं
चन्द्र भी है
बादलों की ओट में छुपा हुआ,
यह चंचलता कब तक
ग्रहण में रहेगी
विरह परतें तो हटाओ
जल में भी है कमल अधीर
इसकी तृष्णा तो मिटाओ।

………. कमल जोशी ………

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/01/2016
    • K K JOSHI K K JOSHI 07/01/2016
  2. salimraza salimraza 07/01/2016
    • K K JOSHI K K JOSHI 07/01/2016
  3. डी. के. निवातिया D K Nivatiya 07/01/2016
  4. Bimla Dhillon 08/01/2016

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