“मेरी क़लम भाग-11” डॉ.मोबीन ख़ान

कहने को कल थे मुफ़लिस,
मग़र इंसानियत तो थी।
एक-दूसरे के ग़म के थे साथी,
और हैवानियत ना थी।।

ये कैसी हुई तरक़्क़ी,
की सब भूल गए।
दंगे हुए फ़साद हुए,
मोहब्बत भूल गए।
कहने को कल थे अनपढ़,
मग़र इतनी नफ़रत ना थी।।
एक-दूसरे के ग़म के थे साथी,
और हैवानियत ना थी।।

आज़ ज़ेबों में है दौलत,
पर ज़ुबान पर है नफ़रत।
बर्बाद हो रहा जहांन,
लोगों में नहीं बची चाहत।
कहने को कल थे परेशान,
मग़र इतनी सिसकियां ना थी।।
एक-दूसरे के ग़म के थे साथी,
और हैवानियत ना थी।।

अब क़ोई करता नहीं भरोसा,
अपने ही ख़ून पर।
खाया हुआ है धोखा,
मज़हब के नाम पर।
कल भी थे ये मज़हब,
मग़र इतनी दरिंदगी ना थी।।
एक-दूसरे के ग़म के थे साथी,
और हैवानियत ना थी।।

कहने को कल थे मुफ़लिस।
मग़र इंसानियत तो थी।।

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 06/01/2016
    • Dr. Mobeen Khan Dr. Mobeen Khan 07/01/2016
  2. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 06/01/2016
    • Dr. Mobeen Khan Dr. Mobeen Khan 07/01/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/01/2016
    • Dr. Mobeen Khan Dr. Mobeen Khan 07/01/2016

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