||सहादत और सियासत ||

“शांतिप्रिय हुआ है भारत
इन आतंकी हमलो में
सहिष्णुता फैली है चहु ओर
इन आतंकी हमलो में ,

ना कोई आँखे रोती है
ना दिल किसी का पसीजा है
छलनी हुए शहीदों के सीने को
मामूली सी घटना समझा है ,

कहा गए अब वो हिजड़े सब
जो अवार्ड वापसी में प्रतिभागी थे
क्या मर गए अभिनेता वो
जो असहिष्णुता का राग सुनाते थे,

असहिष्णुता पे छाती पीटने वाली मीडिया
अब क्यों विधवा बन बैठी है
क्यूँ इन आतंकी हमलो को
सहिष्णुता समझ बैठी है ,

वो सेक्युलर मुर्दे कहा हुए दफ़न
जो पैसे और फ्लैट बाँटे थे अख़लाक़ को
क्या रईशी मिट गयी उनकी अब
करते अनदेखा भारत के वीरों को ,

बंद करो ये तमाशा अब
वो राजनीती के ठेकेदारों
ना कफ़न नसीब होगी तुमको
वो धार्मिक सियासत के पहरेदारों,

उतारके चश्मा राजनीती का
थोड़ा सा तुम भी रो लो
शहीदों के पावन क़ुरबानी पे
सहानुभूति के दो शब्द तो बोलो ,

चुनावों में देशभक्ति चिल्लाने वाले
क्यूँ सांप सूंघ गया है तुमको
क्या आतंकी समधी लगते है
या अपनी बेटी बेचीं है उनको ||

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया dknivatiya 06/01/2016
  2. omendra.shukla omendra.shukla 07/01/2016

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