जीवन ज्योति

ऊषा की बेला में
नव उदित सूर्य की
मनमोहक लालिमा में,
मैने तुम्हें ढूंढा -पा लेना चाहा;
पर तू ना मिला ।
नयन भटकते रहे –
खोज में तेरी
उठते हुए सूर्य के साथ
ढलते हुए सूर्य के संग –
हर घड़ी- हर क्षण ।
सुबह से दुपहर
दुपहर से शाम की
अन्तिम चमकती रेखा तक ;
मन्दिर से मस्जिद
चर्च से गुरुद्वारे तक ।
लौटा हर बार
निराश-थका-हारा !
दलित हृदय के अन्तर को
कुछ चैन मिले -यह सोच
नयन जो बन्द किए
क्या पाता हूं वह छवि तेरी
जिसे खोज खोज मैं हार चुका ,
इक उज्जवल तारे की भान्ति
यूं दमक रही मेरे मन में
जैसे हो शेष के पहरे में
इक नागमणि ।
अब डर ना मुझे -हे दयानिधे
मैं ना तुम से दूर
ना तू मुझ से दूर
मैं भूला था घबरा जो गया
मैं समझा था हुआ भाग्य क्रूर ।
तुम दूर कहां -हो इतने पास
जैसे रहते हैं प्राण और श्वास
ना तू तू है ,ना मैं मैं हूं
हर कण में ज्योति एक ही है,
क्या मेरा मन क्या तेरा कण ।

—— बिमल
(बिमला ढिल्लन)

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/01/2016
  2. bimladhillon 06/01/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/01/2016
  4. bimladhillon 06/01/2016

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