इंसान और पर्यावरण

आज ये आर्टिकल मै दुनिया में आने वाली घटनाओ को मद्देनज़र रखते हुये लिख रहा हु मै आशा करता हुँ आपको ये आर्टिकल पसंद ए और आप मुझे जरूर कमेंट करे क्यूंकि मैं बहुत बड़ा साइंटिस्ट नही हुँ सिर्फ एक साधारण सी फैमिली में रहने वाला लड़का हुँ । अब आगे मेरा अरिटक्ल पढ़े जो की मैंने के ऊपर लिखा है।
हमारे सोर मंडल में सभी ग्रहो की उत्पति कैसे हुई ये मुझे नही पता ? हमारी पृथ्वी के आलावा सोर मंडल के और किसी गृह में जीवन है या नही ये मै नही जानता ? परन्तु आज मैं हमारी पृथ्वी के जीवन चक्र के बारे में अपने विचार प्रकट करता हूँ। पृथ्वी में जीवन कैसे पनपा ये नही जनता। परन्तु एक बार जब मैं डिस्कवरी चैनल देख रहा था देख रहा था तब उसमे बतया था की पृथ्वी में जीवन एक बैक्टीरिया पनपा था। हलाकि मेरा मानना है यह है जहाँ जीवन अपने आप पनप जाता है हमारी धरती पर हमारी प्रकति ही हमारा पालन पोषण करती है प्रकति ने अपने अंदर पल रहे सभी जीवो को एक सामान माना है। किसी के साथ भी भेद भाव नही किया। चाहे पेड़-पौधे हो जानवर हो या इंसान हो सभी को इस पृथ्वी पर एक सामान अधिकार है। आज मई पृथ्वी के उन सभी जीवो के प्रति अपने विचार प्रकट करता हूँ इस दुनिया में पेड़ पौधे और पशु पक्षी सबसे पहले आए. हम सभी जीवो को हमारी पृथ्वी ने जीवन दिया है और जीवन जीने के लिए संसाधन उपलब्ध कराये है। इस दुनिया सबसे विकसित जीव इंसान अपने आप को मानता है। तो अगर इंसान के नजरिये से इंसान ही सबसे विकसित जीव है तो पृथ्वी पर शांति , ख़ुशी और पृथ्वी को बचाने की जिमेदारी उस पर अधिक है। इंसान को ये नही पता की हमारी पृथ्वी ही हमारा स्वर्ग है और पानी ही अमृत है। इसलिए अगर इस स्वर्ग जैसी पृथ्वी का अंत होता है तो उसके लिए सबसे बड़ा कारण होगा इंसान। ये सभी आधुनिक विकास किस काम का है ? क्या आपने कभी सोचा है की हमसे पृथ्वी के जीव एवं पेड़ पौधे कितने दुखी है। आज मानव ही मानव का दुश्मन बन गया है। मै आपको एक रोमांचित बात बताना चाहता हूँ आपको यह तो पता ही होगा की जब एक कछुआ अपनी पीठ के बल उल्टा हो जाता है तो उसके लिए सीधा हो पाना कितना मुश्किल हो जाता है। एक दिन मै ‘ वाइल्ड ‘ चॅनेल देख रहा था उसमे मैंने देखा की एक कछुआ अपनी पीठ के बल पर उल्टा हो गया है। वह कछुआ आके उसकी मदद करने लगा और वह उस कछुए को सीधा करने में कामयाब रहा। इस घटना को देखकर मेरे मन में यह विचार आधा की पशु पक्षियों के अंदर इंसानियत है परन्तु इंसान के अंदर नही है। अगर इंसान अपने आप को इतना ही विकसित मानता है तो वह इस पृथ्वी के किसी भी पक्षी से अपने शारारिक बल से क्यों नहीं टकराता क्यों उनसे झुण्ड में और आधुनिक हथियार के साथ टकराता है। इंसानो मार्स पर जाने की तयार कर रहे हो। जितना खर्च तुमने मार्स पर जीवन तलाशने के लिए किया है। उतना खर्च हमारी इस पृथ्वी को बचाने के लिए क्यों नहीं करते हो। इंसान तू ये क्यों नहीं समझता है की प्रकति की शांति के आगे तू बेब्स है। तू खुद ही इस पृथ्वी और प्रकति की देन है जो भी चीज़े तूने बनाई है उन सभी चीज़ो में प्रकति की आत्मा बस्ती है तेरी बनाई हुयी सभी चीज़ो में प्राकृतिक संसाधन इस्तमाल हुए है। आज इंसान ही इंसान से दुखी है। तूने परमंडु हथियार और अन्य हथियार को बनाने के लिए किया है उतना खर्च इस पृथ्वी को बचाने के लिए कर। आज इंसान की बढ़ती आबादी से ही पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्र में बढ़ोतरी हुयी है , इंसान के कारण ही ओजोन लेयर में छेद हुआ है और इंसान के कारण ही पोल्लुशण हो रहा है। क्या तूने कभी सोचा है की अगर तेरे कारण इस पृथ्वी में पशु पक्षी पर पेड़ पौधो का नशा हो जायेगा ,तो तू जीवित रह पायेगा क्या ? आज तू अपने स्वर्थ के लिए हाथी के बेशकीमती दाँत उनसे छीन रहा है ,रहिनोसॉर्सेसेस के सिंह छीन रहा है और बांधो की हत्या करके उनके सवाल ले रहा है , बैट बनाने के लिए पेड़ो को काट रहा क्यों। किसके लिए ? कभी सोचा है की तेरी करतूतो से पेड़ पौधे एवं पशु पक्षी कितने दुखी है ? पेड़ पौधे तो हमें जीने के लिए ऑक्सीजन प्रदान करते है और हमें अपने स्वार्थ के लिए उन्हें ही काट रहे है। क्या। तूने कभी सोचा है की प्राकतिक आपदाओ का अहसास सबसे पहले पशुओ को ही क्या होता है ? ये सब कुदरत करिश्मा है। कुदरत के कानून का इंसाफ कुदरत निष्पक्ष रूप से करती है। परन्तु इंसाफ के बनाये कानून में बेगुनाहो को भी सजा हो जाती है। तो मेरा बस यही कहना है हम अंत के करीब है हमें इस पृथ्वी को बयाना चाहिए न की इसके सर्वनाश का कारण बनाना चाहिए। अगर इस आर्टिकल से किसी को दुःख पहुँचता है तो मुझे माफ़ करना। मेरा इरादा किसी की भावनाओ को ठेस पहुचाना नही है। धन्यवाद
written by
T.VEERU
published by
ALOK UPADHYAY

2 Comments

  1. Mukesh Joshi 06/01/2016
  2. Alok Upadhyay Alok Upadhyay 07/01/2016

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