नव वर्ष

लो फिर इक बार धरती घूम आई !

अपनी धुरी पर नाचती लट्टू सी ,
सूर्य के चहुँ ओर दौड़ती टट्टू सी ,
पल भर को भी न किया विश्राम ,
चलती रही निरन्तर अविराम ,
लो फिर एक बार धरती घूम आई !

कभी फागुन के फूल खिलाये ,
कभी सावन की झड़ी लगाई ,
कभी जेठ के ताप को सहती ,
कभी पूस ,माह में ठिठुराई,
लो फिर एक बार धरती घूम आई !

हथेली पर हिमालय से पर्वत सहेजे ,
अंजुरी में नदियों के जल को समेटे ,
खेत ,वन , उपवन माथे पे सजाये ,
सागर की बूँद भी न कहीं छलकाई,
लो फिर एक बार धरती घूम आई !

गाड़ी, मोटर ,जहाज सब आगे बढ़ते रहे ,
पंछी आसमानों में उड़ते रहे ,
बाघ ,हाथी ,घोड़े सब साथ लिए ,
मोर ,मोरनी को भी परिक्रमा करा लायी ,
लो फिर एक बार धरती घूम आई !

कभी थी ब्रह्माण्ड के इस दुर्गम छोर,
कभी पहुंची लाखों मील उस ओर ,
इंसान क्षुद्र खेलों में उलझा रहा ,
प्रभु की लीला उसे कहाँ समझ आई ,
लो फिर एक बार धरती घूम आई !

4 Comments

  1. पंडित राजन कुमार मिश्र पंडित राजन कुमार मिश्र 05/01/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 05/01/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/01/2016
  4. Dr Deepika Sharma Dr Deepika Sharma 19/02/2016

Leave a Reply