वेदना

झूम रहा दावानल
मन में अंगार लिये
बुझा दीप झूम रहा
ज्वलित श्रृंगार लिये,
हिमबर्फ यहां पिघली
बंजर में बयार लिये
मुक्त हुई मेघ कलाऐं
छद्म अलंकार लिये,
कोमल नयन झरे
प्रीत अश्रुधार लिये
ज्वालाऐं ज्यों बहकी
सहमे अहंकार लिये,
हृदय में पुष्प महके
कांटों के प्रहार लिये
वेदनाऐं भी हुई साक्षी
प्रेम का उपहार लिये।

….. कमल जोशी …..

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  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/01/2016

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