इन्तजार: एक उम्मीद

रोशनी आती है
रात का इन्तजार खत्म होता है
चांदनी आती है
अमावस का इन्तजार खत्म होता है
समन्दर की लहरें भी
भीगो जाती हें रेत की बूंदों को
एक तुम ही हो
जिसकी सिर्फ याद आती है।
सोचता हूं
यादों की गलियों से
लिखूं कुछ कहानी कविताऐं
मगर मंजिल कहां
गुजरी राहों के सफर हैं कि
रूकने का नाम नहीं लेते
सपना सा लगता है
तुम्हें स्पर्श करना, तुमसे बातें करना।
दिल की गहराईयों में
इस तरह डूब गई हो तुम कि
बुलबुला भी उठता है
तो सीने में चुभन होती है
क्यों संजोयी तुमने
तस्वीर अपनी मेरे दिल में
तकदीर में रंग भरूं
तो तकलीफ क्यों होती है तुम्हें।
खत्म होगा यह इन्तजार
या यूं ही खड़ा रहेगा अभिमान
विशालकाय वृक्ष के समान
और कुछ आरियां
कर देंगी टुकड़े टुकड़े शाखाओं के
चीर दी जायेगी या
जला दी जायेंगी
अब तो तुम्हारी ऊंचाईयों में
प्रश्न है चिन्तन का गहरा
तुम खत्म करोगी इन्तजार?
या खत्म हो जायेगा इन्तजार?

…………. कमल जोशी …………

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 04/01/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/01/2016
  3. omendra.shukla omendra.shukla 04/01/2016

Leave a Reply