बेसाहारे कि पुकार

ठिठुर -ठिठुर कर काँप रहे है फुटपाथ पे कितने ग़रीब बेसाहारे ,
तन ढकने को न कपड़ा है न ही कोइ चादर, ऐसे कितनों कि बात बताऊँ , हम सब है क़िस्मत के मारे।
तुम जब सोते हो बंद कमरे में मोटी सी रजाइ ताने , कितने अनाथ ठंड में मर जाते है फुटपाथ पे रोज़ नजाने,

हमारा दर्द कभी किसी ने न जाना ,क्यु हम सब फुटपाथ पे है रहते ,
थककर हम सब चुर हो चुके है ,विधाता कि मार सहते-सहते।
एक देश के वासि हमसब ,पर तुमको हि मिले क्यु सारि ख़ुशियाँ ?
हमारे हिस्से सिर्फ़ मिलते है फटा चादर और बासी-सुखी रोटियाँ !

ग़रीबों को क्या भुख नहीं लगती ? या न ही लगे उसे कोइ ठंड?
ख़ुश रहना भी तो उनका हक़ है , सुखी रहना उन्हे भी तो है पसंद!
सुना है अमीरों का दिल बहुत बड़ा होता है, करते है कितने दान धर्म,
फटे पुराने कपड़े कुछ हमें भी दे दो , कर दो कुछ पुण्य कर्म ।

उन अनाथों में मैं भी एक हु , सुनाए जो दुखियारो कि कहानि,
मेरे पास भी न कोइ कपड़ा है ,न खाने को रोटि , एसी है हमारी जीन्दगानि।
मिल जाए अगर तन ढकने को ,शर्दि में मिल जाएगा थोड़ा तो राहत,
इस साल कि ठंड से बच जाउगां, बस इतनी सी है चाहत।

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 04/01/2016
    • Sampa 05/01/2016
  2. omendra.shukla omendra.shukla 04/01/2016
    • Sampa 05/01/2016

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