मुक्तक-3

जब जब मेरी राहों में कोई किरण, तेरे साये का सेहरा बांधती है
ना जाने क्यों? ये बावरे से बादल सूरज के पहरेदार हो जाते हैं ||

मुकम्मल इश्क़ यूँ ही नसीब नहीं होता “रोशन”,, हाल “इश्क़” के “श्” जैसा हो जाता हैं.
किसी को तुम मुकम्मल करते हो खुद को आधा करके ||

By Roshan Soni

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