“गुम होता नारीत्व”

देख देखकर हाल देश का
मेरी आँखे तो भर आती है
घर की इज्जत कोई नारी कैसे
खुद लुटाकर आ जाती है
क्या गुनाह किया तुम्हे दहलीज कूदाकर
अवसर दिये नयी सोच बनाकर
करोगी नाम रोशन तुम उनका
क्या गुनाह किया उम्मीद लगाकर
क्यू बदनाम किया नारीत्व को तुमने
क्या दूजा पूरा करेगा सपना
कभी इसके संग,कभी उसके संग
कितने बनेंगे तुमरे सजना
तुम्हारी इज्जत की तुम रखवाली
क्यू अपनी आन लूटाती हो
झूठी शोहरत पाने की खातिर
जिस्म का क्यू बाजार लगाती हो
शालीनता,पवित्रता,निर्मलता
कुलीन चरित्र से मिले सफलता
प्रेम रूपी मंदिर मे बैठे
सती सावित्री सी निर्छलता
क्या सडको पर धक्के खा खाकर
शान तुम्हारी बढ जायेगी
फैशन मे क्यों चूर हुई तुम
क्या मन को निर्मल कर पाओगी
ए भारत की नारियो !
सती सावित्री सा था चरित्र तुम्हारा
आन से जीना,शान से मरना
क्यू गुम हो रहा सतीत्व तुम्हारा ।