जाड़ों का मौसम …

जाड़ों का मौसम …

लो, फिर आ गया जाड़ों का मौसम ,
पहाड़ों ने ओढ़ ली चादर धूप की
किरणें करने लगी अठखेली झरनों से
चुपके से फिर देख ले उसमें अपना रूप ।

ओस भी इतराने लगी है
सुबह के ताले की चाबी
जो उसके हाथ लगी है ।

भीगे पत्तों को अपने पे
गुरूर हो चला है
आजकल है मालामाल
जेबें मोतियों से भरीं हैं ।

धुंध खेले आँख मिचोली
हवाओं से
फिर थक के सो जाए
वादियों की गोद में ।

आसमान सवरने में मसरूफ है
सूरज इक ज़रा मुस्कुरा दे
तो शाम को
शरमा के सुर्ख लाल हो जाए ।

बर्फीली हवाएं देती थपकियाँ रात को
चुपचाप सो जाए वो
करवट लेकर …

— स्वाति नैथानी

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 31/12/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 01/01/2016
  3. Navratan pal 07/09/2016

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