बुनती हूँ ख्वाब

बुनती हूँ ख्वाब
बिखर जाते हैं
आती हूँ शरण में तेरी
खुद ही संवर जाते हैं
गिनती हूँ नाकामियां
कभी जो अपनी
हैं सवाल बहुत ,जो
कभी रुला जाते हैं
हो दम कितना भी बाज़ुओं में
तूफ़ान अक्सर झुका जाते हैं
तेज़ हवा के झोंके
घने पेड़ों को हिला जाते हैं

हमें इक वहम है शायद
ज़िन्दगी मुठी में हो सकती है
न हो जो रज़ा उसकी
वो पल में ,खो वोःसकती है

फिर भी न जाने क्यों
ख्वाबों में उलझी रहती हूँ मैं
जानती हूँ बस में नहीं ज़्यादा
धागे आशाओं के बुनती रहती हूँ मैं

है फितरत हमारी
हर पल कुछ ढूँढ़ते हैं हम
नहीं जानते, वोःहै क्या
किसे ढूँढ़ते हैं हम
कुछ सोचा तो लगा
,सुकून ही है शायद
जिसे हर जगह हर पल
ढूँढ़ते हैं हम

कहाँ मिलता है
वोःबाज़ारों में
न महल आलीशान
न चौबारों में
मिल जाये कभी तो
मिलता है वोः
मन के ही गलियारों में

6 Comments

  1. gyanipandit 31/12/2015
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 31/12/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 31/12/2015
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 31/12/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 31/12/2015
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 31/12/2015

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