बातें

बातें कुछ अनसुनी ,अनकही ,
रह गई मन की मन में ही।

बातें जो तुमसे करनी थी ,
बातें जो तुमको कहनी थी ,
तुम संग हँस कर सहनी थी।

तुम बिन भार बन गई है ,
बातों का अम्बार बन गई है,
मन का गुबार बन गई हैं।

बातें, आधी रात में उठ कर ,
मन में करती हैं गड़बड़ ,
मुझ को बड़ा सताती हैं।

बातें सारी रात जगाती हैं ,
कभी कभी वोह तो हँसाती हैं,
कभी कभी युः ही रुलाती हैं।

इन बातों का क्या तो करूँ मैं ,
तुम बिन कैसे धीर धरु मैं,
क्यूँ सबको परेशान करूँ मैं।

बातें जो सिर्फ तुमसे करनी थी ,
बातें जो तुमको कहनी थी ,
किसी और से कैसे कह दूँ ?

वैसे भी किसी ने कहा है ,
कि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी,
लोग बेवजह ,उदासी का सबब पूंछेंगे,
किस किस को हल्कान करूँ मैं .

बातें कुछ अनसुनी ,अनकही ,
रह गई मन की मन में ही।

7 Comments

  1. asma khan asma khan 05/01/2016
    • Manjusha Manjusha 05/01/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/01/2016
    • Manjusha Manjusha 05/01/2016
  3. कड़वा शब्द kadwashabd 11/01/2016
    • Manjusha Manjusha 19/01/2016

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