तडपता कानून

ये जिस्म के घाव तो भर जायेगे
कैसे भरेंगे, वो आघात
जो दे रहे वहशी दरिन्दे
नोच डाले सारे जज्बात
बाँधी थी कानून ने आखें
ना ऊँच -नीच का भेदभाव हो
अपने पराये हो समान सब
ना न्याय मे,इनका प्रभाव हो
अमीरी-गरीबी ना आयी आडे
ना लिंग ने रोके कदम हमारे
क्यो आ रही अब ,दीवार न्याय मे
नाबालिग कर रहे, कानून किनारे
अपराध घिनौना कर सकते है
फिर सजा मे दया क्यू दिखलाना
जिसकी आबरू लूटी इसने
उस मासूम को कटघरेमे,क्यू लाना
गंदगी का बीज बुरा तो
पेड भला क्या फल देगा
उम्र बनाया हथियार इन्होंने
ये सर्प अमृत कैसे देगा
ये भविष्य, नही देश का
ये मान भंग भी कर देगे
ना सुधरेगे,कानून दया से
ये ओर गुनाह ही कर देगे
तडपता है कानून हमारा
आँसूओ से पट्टी भीगी
उम्र हथियार तोडो अब इनका
मिले सजा सीधी-सीधी ।

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/12/2015

Leave a Reply