||भाषाओँ की वेदना ||

“गहरी संवेदना आखों में लिए
भाषाओंं का मेल हुआ
सबकी व्यथा थी एक जैसी
करुण क्रंदन का खेल हुआ ,

देख अंग्रेजी की बढ़ती मांग
छाता भय का बादल खुद पे
असतिस्त्व बचाने दुविधा मन में
करता कण्टक प्रहार मुझपे,

ना रहे अब तुलसी,केशव ,सुर
काली ,भवभूति और बाण का समय गया
कौन करेगा स्थापित फिर हमको
सहसा ऐसा क्यों हो गया ?,

मतृभाषाए जिन्दा है
दुनिया के काफी देशों में
क्यूँ क्लेश बढ़ा है भारत में
क्यूँ पड़े है हम अवशेषों में ,

कब होगा फिर सृजन हमारा
जाने कब फिर वो गरिमा लौटेगी
अंग्रेजी के दलदल में फसके
शायद अब ये जीवन मिटेगी ,

खुद की भाषाओँ संग जीना सीखो
कब तक खैरातों पे जिओगे
कुछ तो खुद की उपज रखो तुम
कब तक उधार को ढोओगे तुम||”

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