||यक्ष के मेघदूत ||

“तुम नीले हो मतवाले हो
सुन्दर और सुहाने हो
तुमसे ही है जीवन छाया
सारी काया और सृष्टि की माया ,
दूर दूर तक तुम फैले हो
संपूर्ण जगत में तुम छाये हो
करते हो निज कार्यों को अपने
पर भूल कुछ तुम आये हो ,
करके वर्षा मस्त किया है
फिर ये प्रेम नगर क्यों त्रस्त किया है
हो वेगवान तुम बहुत महान ,
उपकारी हो ,फलदायी हो
जीवन के आधार हो तुम
जनमानस के कल्याणी हो ,
छोड़ कभी स्वकार्यों को
मुझपे तरस दिखओना
विरह में जलती अग्नि को मेरे
कुछ तो राहत पहुचाओना ,
करो स्वीकार निवेदन मेरा
पहुचाओ सन्देश प्रियतम तक मेरा
कहना ,उनको भुला ना मै
विरह में उनके हु जीवित
उनके प्रेम की आस लगाये
अश्रुओं से ह्रदय को अपने किया हु सिंचित ,
सन्देश सुनाना हे मेघदेव तुम
ना कलियाँ अब तक मुस्कायी है
ना मदमस्त पवन अब बहते है
वो उच्छृंखल जलधारा भी
शोषित हुए से लगते है ,
भौरों का गुंजार सुनहरा
वो तितलियों का पुष्पों पे मँडराना
है परिभाषी ये विरह का मेरे
तिरस्कार है इनका यह, तुम्हारे प्रेम को दर्शाना,
हो गया हु दुर्बल अत्यंत मै उनके बिन
कंटक सा चुभता है जीवन ये
हो गया हु अब मै कुछ प्राणहीन ,
वो कनक सुशोभित बाजूबन्द
जो बाजुओं में धारण होते है
दुर्बलता के कारन वो आज
कलाइयों में शोभित होते है,
कंदमूल आहार बना है
जीवन का आधार बना है
पर्वत की ये समतल धरती
शयन का उपहार बना है ,
नीली छतरी सी अम्बर के निचे
पूनम की प्रकाशमय रातों में
आती नहीं है सहज ही निद्रा अब तो
तुम्हारे विलय की यादों में ,
होते ही पूरा ये श्राप शीघ्र
सर्वप्रथम तुम्हे ही याद करूँगा
बीते हुए इस विरह वर्ष का
संग तुम्हारे उपहास करूँगा ||”

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