सर्द तरंग

सूर्य दिशा जो डगमगाई
पत्तों में छुपे अन्धकार में
पवन तेज सुलगती आई
सितारों ने चन्द्रकांत संग
निशा आंगन शीत बढ़ाई
नहीं पतझड़ यह मौसम
बसंत की हो रही विदाई,
हिम परतों की ज्वाला में
कम्पित मचा रहा उत्पात
मेध देव का यह अनुराग
रश्मिकणों में रच वैराग्य
उष्माओं को स्तब्ध किया
नियति हुई मधुर मोहक
स्वच्छ सुंदर यह मोदक,
नभ का विचित्र खण्डन
चहुंओर बहती सर्द तरंग
निष्काम सूना धरती अंग
भावों ने रचा एकाकीपन
महलों में सिमटा बचपन
महाशून्य का कैसा देश
प्रकृति ने बदला परिवेश।

…….. कमल जोशी …….

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